राष्ट्रीय (12/12/2014) 
कवि दीपक शर्मा की कलम से

दिल की गीली ज़मीं पर ख्वाबों का बिस्तरा
ख़्वाबों को मिल रहा जहाँ सिरे से एक सिरा

कोसो की दूरियां ख़त्म हो गई लम्हात में
आँखों को मूँद जब भी तसव्वुर कीया तेरा

महकता रहा तमाम दिन मैं देख ख्वाब एक
साये संग तेरे रात भर साया लिपटा था मेरा

देखी गई है उसमें बहुत इंसानियत की लौ
जग ने बुझा दिया चिराग जो कह के सिरफिरा

चलने दो ज़रा हवा ख़ुद ही हो जायेंगे बेनकाब
पत्ते सब ज़र्द उड़ जायेंगे रह जाएगा दरख्त हरा

आदत ये हुमें आपकी कतई अच्छी नहीं लगती
गलती भी की और ख़ुद से पहले आंसू दिए गिरा

कोई भी तो नहीं जहान में समझा है तुझे "दीपक"
तन्हाई में दो बात चल तू ख़ुद से कर ले ज़रा

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